Friday, July 31, 2009

सिंघाडा उत्पादन में सफलता
एक कहानी, किसान की जुबानी


कठिन हो गई आज किसानी पड़ा वक्त है आडा ,देख परख कर भैया तुझको देगा साथ सिंघाडा ।
हमने ही खेती का सिस्टम अपने हाथ बीगाडा ,कम्पनसेट करे अब उसको लेकर क्रोप सिंघाडा ।

सिवनी जिला मुख्यालय से करीब ३५ किलोमीटर दूर स्थित बरघाट तहसील के ग्राम बोरी खुर्द के श्री विलास तिजारे को कृषि क्षेत्र में कुछ खास कर गुजरने का जज्बा बचपन से ही था । श्री विलास तिजारे प्रारंभ से ही परंपरागत खेती के रूप में धान, गेहूं, चना, लखोडी की खेती करते आ रहे थे परन्तु परंपरागत खेती धीरे-धीरे घाटे का सौदा साबित होने लगा धान की खेती की कार्यपद्धति तथा आर्थिक समस्या का समाधान इन्हे सिंघाडा की खेती में दिखा कृषक विलास तिजारे वर्ष २००७-०८ में सिंघाडा फसल उत्पादन तकनीक पर जानकारी के लिए कृषि विज्ञान केन्द्र, सिवनी के संपर्क में आये जहाँ से प्रोत्साहन भी मिला एवं सिंघाडा उत्पादन तकनीक पर prashikshan दिया गया पूर्व में सिवनी जिले में सिंघाडा की कांटे वाली देशी प्रजाति कृषको द्वारा लगाई जा रही थी जिसका उत्पादन बहुत ही कम था इसी तारतम्य में कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिको द्वारा कृषक विलास तिजारे के प्रक्षेत्र पर सिंघाडा की उन्नतशील प्रजाति लाल गुलरा जिसके फल आकार में बड़े एवं अधिक उत्पादनवाली प्रजाति का परिक्षर किया गया । इस प्रजाति की बेल को माह जुलाई में रोपित कर माह सितम्बर २००८ से दिसम्बर २००८ तक २।५ हैक्टेयर क्षेत्र से मात्र सिंघाडा विक्रय कर २ लाख रूपये का शुध्द लाभ अर्जित किया गया एवं साथ ही साथ धान की गहरी बंधियों में एक फीट पानी में सिंघाडा की विभिन्न उन्नतशील प्रजातियों लाल गुलरा, करिया हरीरा, भूरी गुलरी , लाल गठुआ का मूल्यांकन किया गया एवं प्रति एकड़ चालीस हजार रूपये का शुध्द लाभ कृषक द्वारा अर्जित किया गया ।कृषि विज्ञानं केन्द्र, सिवनी के वैज्ञानिकों द्वारा निरंतर मार्गदर्शन एवं निरीक्षर कृषक विलास तिजारे के प्रक्षेत्र पर किया गया एवं प्रदर्शन को देखने ज.ने .कृषि विज्ञानं केन्द्र से पधारे डॉक्टर यू.एस.गौतम आंचलिक समन्वयक जोन सातवा (भा.कृषि.प।) एवं डॉक्टर नलिन कुमार खरे संयुक्त संचालक (विस्तार सेवायें) द्वारा भ्रमर एवं अवलोकन किया गया एवं सिवनी जिले के लिए सिंघाडा को उपयोगी फसल बताया एवं केन्द्र द्वारा किए गए कार्य की सराहना की ।कृषि विज्ञानं केन्द्र के द्वारा कृषकों को यह सलाह दी जाती है की आने वाले समय में सिंचाई की समस्या को ध्यान में रखते हुये कृषक अपने खेत का एक चौथाई भाग जल कृषि में परिवर्तित करे जिससे भूमिगत जल स्तर को बढाया जा सके ।

संकलनकर्ता - एन.के.सिंह एवं ध्रुव श्रीवास्तव

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