अमरुद की बागवानी भारत वर्ष के सभी राज्यों में की जाती है । यह विटामिन सी का बहुत अच्छा एवं सस्ता स्त्रोत है । पिछले कुछ वर्षों में अमरुद उत्पादन में लगातार कमी आ रही है जिसके कई कारणहै बागों का अधिक घना होना, अमरुद के बागों में उचित प्रबंधन का अभाव, कीडे एवं बीमारियों के सामयिक नियंत्रण का अभाव एवं बागों में उर्वरक, खाद एवं सूक्ष्म पोषक तत्त्व का प्रयोग न करना । इसके अलावा अन्य फल वृक्षों की भांति अमरुद वृक्ष भी एक निश्चित आयु (१५-२० वर्ष) के बाद कम उपज देने लगते है । पुराने बागों के फलों का आकार छोटा हो जाने से गुणवत्तायुक्त उत्पादन में कमी आ जाती है । अत: पुराने बागों की जो गुणवत्तायुक्त जीर्णोंद्वार देते आर जीर्णोंद्वार है अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है ।
जीर्णोंद्वार क्या है ?
जीर्णोंद्वार का अर्थ पुराने एवं अनुत्पादक वृक्षों को नया जीवन प्रदान करना है पुराने वृक्षों की वांछित कटाई छटाई करके नए कल्लो का सर्जन करना ताकि उन पर ओजपूर्ण फलन आ सके ।
जीर्णोंद्वार तकनीक -
अमरुद के ऐसे बागों का चुनाव करना चाहिए जिनकी उत्पादकता में काफी कमी आ गई हो ऐसे बागों को मई के महीने में जमीन की सतह से १.० से १.५ मीटर की ऊंचाई से कट देते है । कटाई के लिए तेज धार वाली आरी या शक्ति चालित आरी का प्रयोग करते है । कटाई करते समय इस बात का विशेष ध्यान देना चाहिए की शाखाएँ फटे नही वरना बीमारी का प्रकोप बढ़ जाता है । शाखाओं को फटने से बचने के लिए चिन्हित स्थान पर नीचे झुकाव की तरफ़ ८-१० सेंटीमीटर गहरा सीधा काटे । तत्पश्चात उसी स्थान पर ऊपर से कटाई करे । कटाई के तुंरत बाद ताजे गाय के गोबर का लेप कटे हुए भाग पर लगाना चाहिए ताकि सूक्ष्म जीवर्नोओं तथा रोगों के सक्रमण से बचाया जा सके ।
खाद एवं उर्वरक -
कटाई के बाद पौधों के चारों तरफ़ थाला बना देते है तत्पश्चात प्रति वृक्ष ५० किलोग्राम गोबर की खाद एवं ५ किलोग्राम नीम की खली डालनी चाहिए एवं जुलाई माह में १.३ किलोग्राम यूरिया १.८ किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट एवं ५०० ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश प्रति वृक्ष देना चाहिए । उर्वरक पौधे के ताने से ३० सेंटीमीटर की दूरी पर तथा पौधे के चारो तरफ़ डालते है । तत्पश्चात ८-१० सेंटीमीटर गहरी गुडाई करनी चाहिए अन्यथा वृक्षों को सुखाने का डर बना रहता है । नमी की अवस्था को ज्यादा दिनों तक बनाये रखने के लिए कली पालीथीन, सुखी घास, पुवाल, सूखे पत्ते को थालों के चारों तरफ़ बिछाना चाहिए ।
अन्तवर्ती फसले -
वृक्षों के कटाई के पश्चात् बीच में काफी खुली जगह मिल जाती है खाली जगह पर कुछ फसल या सब्जिया लगाकर अतिरिक्त आय अर्जित की जा सकती है । लोबिया (बरबटी) , अदरक , हल्दी , जीमीकंद , मटर , भिन्डी, मिर्च, फूल गोभी, पत्तागोभी, इत्यादि सब्जिया की खेती की जा सकती है ।
नए कल्लो का विरलीकरण -
मई माह में काटी गई शाखाओं पर नए प्ररोह बहुतायत से निकलते है । प्रारम्भ में इन प्ररोहों को ४०-५० सेंटीमीटर तक बढ़ने दिया जाता है इसके पश्चात् अक्टूबर माह में इन प्ररोहों को ५० प्रतिशत छोड़ते हुए काट देते है । ताकि कटाई बिन्दु के नीचे अत्यधिक नए प्ररोह विकसित हो सके ।
उपज -
अमरुद के वृक्षों में कटाई छटाई से लगभग २०-३० प्रतिशत उपज में वृद्धि पाई गई है ।
कीट एवं रोग प्रबंधन -
अमरुद में तना बेधक कीट अत्यधिक हानि पहुंचता है, इस कीट की सूंडी डालियों को छेदकर अन्दर ही अन्दर ताने को काटती है , इस कीट के नियंत्रण के लिए छिद्रों को साफ़ कर नुवान (२ मिलीलीटर/लीटर पानी) के घोल में रुई भिगो कर छिद्र में बार कर गीली मिट्टी से बंद कर देते है । अमरुद में उकता रोग के नियंत्रण के लिए कलीसेना (एस्पन्जिल्स नाइजर) नामक जैव कीटनाशी द्वारा उपचारित ५ किलोग्राम सदी गोबर की खाद प्रति गड्ढे में मिलाकर रोपाई करे । पौधों में करंज की खली का उपयोग करें ।